Wednesday, January 2, 2019

समुंद्र


सागर की लहरें आती हैं,
करने नमन किनारों को,
और बिखड़ जाती हैं,
न्योछावर कर अर्जित सर्वस्व ।

सतत प्रयत्न, निःस्वार्थ भाव
कोई सिख सके तो सीखे इनसे,
बिना आश के, कर्तव्य पथ पे,
कार्यरत हैं, ये अनंत काल से।

आंखों में सजी इंतजार की बूंदें
और व्यथित हृदय से उठती हुँकार,
है लेती सबक, उस अथाह समुंद्र से,
जिससे उठती प्रचंड लहरें,
देतीं है शक्ति अपार ।

Saturday, September 22, 2018

विनती

अश्रुपूरित नयन मेरे, हृदय भावविभोर,
करजोर करूँ विनती तेरी, हे मेरे रणछोड़।

हृदय विदीर्ण, मन विह्वल, संशय समर, रुदन चहुओर,
हर लो कष्ट, करो तृष्णा मुक्त, हो आत्मा का, पथ प्रशस्त।

हे बैकुंठ वासी,
गंगा है जिसकी दासी,
नौ नभ, दस दिश के तुम स्वामी,
हर लोक तुमसे, तुम ही हो इस ब्रह्माण्ड के सकल निवासी,
धरो काल रूप, करो ध्वल स्वरूप, हो कालिमा का पूर्ण नाश,
फिर फैले प्रकाश पुंज, अविनाशी सत्य का हो अनंत राज,
इस चराचर जगत में तुम वास करो,
ये अश्रुपूरित नयन तुम्हारे चरण पखारे,
हे कमलनयन, माखनचोर अब इस जग क्रंदन को शांत करो,
हे मेरे मन के सम्राट, सहस्त्र कोटि नमन तुम स्वीकार करो।।

जन्मदिवस


ये जन्मदिवस, ये नव प्रभात
आयी लालिमा सूरज की, मिटा जगत का अंधकार,
कुछ पुष्प खिले, कुछ खग किलके,
खुशियों की हो असंख्य बौछार,
पुलकित जीवन, अपार हर्ष,
उम्र का अगला ठहराव।

यह है एक बुझता दिया,
मिले सीमित मोती, कर्तव्य हज़ार,
गिन गिन कर तू खर्च इसे,
कर दूसरों की और खुद को पा।

है मानव तन, इक नश्वर माया,
आत्मज्योति है सत्य की छाया,
कलुषित न हो यह परम नीधि,
समझा जो वो प्रभुपद पाया।

मेरा जमीर जागता रहा

मेरा जमीर जागता रहा और सोता रहा भविष्य,
अंदाज जुदा हैं दुनिया के, 
संघर्ष है बहुत कठोर,
हर दरवाजे पे दस्तक दी मैनें,
खायीं ठोकरें दर-दर की,
पर सीख न पाया सफलता का वो मूलमंत्र, 
जिसे कहते हैं जी हुजूरी का अकाट्य तंत्र।

Friday, September 7, 2018

आत्मविश्वास


चराग बुझने से पहले

मंजिलें तय कर।

हर फरियाद पूरी होगी

तू हौसला बुलंद कर।

लौ का नूर बढ़ जाएगा

अगर तबियत से जलने की, तू जुस्तजू कर

Saturday, August 11, 2018

ऐ दिल


इस ज़माने ने, हर शख्स को, बहुत सताया है,
ऐ दिल, ऐ दिल, तू भी इस दुनिया की दस्तूर निभाए जा..

वक्त का पहिया, पहिया..चलता है, चला जायेगा,
ऐ दिल, तू भी इस महफ़िल से गुजर जा..

दुनिया के हैं रंग, हर रंग की है पहचान अपनी,
ऐ दिल, तू भी अपनी पहचान बनाये जा..

Friday, August 18, 2017

बदलाव की डगर

भारत के एक जागरूक नागरिक होने के नाते, भारतीय समाज को जब कोई असहिष्णु कहता है तो मुझे और मेरे जैसे देश के अन्य समान्य जनता को दुःख होता है. कहीं भी कोई घटना हो, तो चाहे न चाहे सभी, उसमें शामिल लोगो की जाति - धर्म जानना चाहते हैं. एक बार ये जानकारी प्राप्त हो जाये, फिर वो निर्णय करते हैं कि अब आवाज उठाया जाय या नहीं. ऐसा नहीं की समाज में ये बदलाव आज आया है, बल्कि ये हमेशा से ही था. एक मनुष्य होने के नाते किसी भी जीवित प्राणी के दर्द को समझने और उसके अनुसार प्रकट करने क्षमता भगवान् ने हमें दी है. पर हम मनुष्यों के बिच हो रही घटनाओं में ही नहीं, बल्कि जानवरों के दुःख में भी भेदभाव करने लगे हैं. किसी को कुत्ता प्यारा, तो किसी को हिरण, तो किसी को कोई और जानवर. हम तार्किक होने के बजाये अपनी-अपनी सोच को आगे बढ़ाना चाहते है. समाज के लिए ऐसी सोच बहुत ही घातक है. वास्तव में हम सभी किसी न किसी मुद्दे के प्रति असहिष्णु हैं और इस सच को स्वीकार कर लेना ही बुद्धिमानी होगी.

मुझे जो दूसरा महत्वपूर्ण मुद्दा लगता है, वो है धर्मनिरपेक्ष और साम्प्रदायिक विवाद. जिन्हें कभी भी अपनी लालच के अलावा किसी और जमीन से जुड़े मुद्दे से सरोकार नहीं रहा, वे अपने को चिन्तकउदार, सहिष्णु और धर्मनिरपेक्ष साबित करने में लगे है. पर जो उनके विचारो से सहमत नहीं, उसे ये पांच सितारा होटलों, बड़े आलिशान बंगलों और महंगे गाड़ियों के साथ शान-शौकत भरी जीवन-यापन करने वाले ये बुद्धिजीवी, बिना झिझक मुर्ख, असहिष्णु और साम्प्रदायिक होने का तमगा थमा देतेहैं. होता इससे भी कुछ नहीं, पर इस देश की गरीब जनता, आम माध्यम वर्ग अपने आप को ठगा महसूस करने लगती है. जिन बुद्धिजीवियों का जीवन इन गरीबों के खून पसीने से चलता है उसे ही ये कीड़ो-मकोड़ो से ज्यादा नहीं समझते.

अभी भी वक्त है, ये बुद्धिजीवी वर्ग संभल जायें, वर्ना जिस देश को हमारे पुरखों ने अपने खून-पसीने से सींच कर, अपने मेहनत के बल पर इस मुकाम पर पहुँचाया है, उसे बिखड़ते देर न लगेगी.