Friday, August 18, 2017

बदलाव की डगर

भारत के एक जागरूक नागरिक होने के नाते, भारतीय समाज को जब कोई असहिष्णु कहता है तो मुझे और मेरे जैसे देश के अन्य समान्य जनता को दुःख होता है. कहीं भी कोई घटना हो, तो चाहे न चाहे सभी, उसमें शामिल लोगो की जाति - धर्म जानना चाहते हैं. एक बार ये जानकारी प्राप्त हो जाये, फिर वो निर्णय करते हैं कि अब आवाज उठाया जाय या नहीं. ऐसा नहीं की समाज में ये बदलाव आज आया है, बल्कि ये हमेशा से ही था. एक मनुष्य होने के नाते किसी भी जीवित प्राणी के दर्द को समझने और उसके अनुसार प्रकट करने क्षमता भगवान् ने हमें दी है. पर हम मनुष्यों के बिच हो रही घटनाओं में ही नहीं, बल्कि जानवरों के दुःख में भी भेदभाव करने लगे हैं. किसी को कुत्ता प्यारा, तो किसी को हिरण, तो किसी को कोई और जानवर. हम तार्किक होने के बजाये अपनी-अपनी सोच को आगे बढ़ाना चाहते है. समाज के लिए ऐसी सोच बहुत ही घातक है. वास्तव में हम सभी किसी न किसी मुद्दे के प्रति असहिष्णु हैं और इस सच को स्वीकार कर लेना ही बुद्धिमानी होगी.

मुझे जो दूसरा महत्वपूर्ण मुद्दा लगता है, वो है धर्मनिरपेक्ष और साम्प्रदायिक विवाद. जिन्हें कभी भी अपनी लालच के अलावा किसी और जमीन से जुड़े मुद्दे से सरोकार नहीं रहा, वे अपने को चिन्तकउदार, सहिष्णु और धर्मनिरपेक्ष साबित करने में लगे है. पर जो उनके विचारो से सहमत नहीं, उसे ये पांच सितारा होटलों, बड़े आलिशान बंगलों और महंगे गाड़ियों के साथ शान-शौकत भरी जीवन-यापन करने वाले ये बुद्धिजीवी, बिना झिझक मुर्ख, असहिष्णु और साम्प्रदायिक होने का तमगा थमा देतेहैं. होता इससे भी कुछ नहीं, पर इस देश की गरीब जनता, आम माध्यम वर्ग अपने आप को ठगा महसूस करने लगती है. जिन बुद्धिजीवियों का जीवन इन गरीबों के खून पसीने से चलता है उसे ही ये कीड़ो-मकोड़ो से ज्यादा नहीं समझते.

अभी भी वक्त है, ये बुद्धिजीवी वर्ग संभल जायें, वर्ना जिस देश को हमारे पुरखों ने अपने खून-पसीने से सींच कर, अपने मेहनत के बल पर इस मुकाम पर पहुँचाया है, उसे बिखड़ते देर न लगेगी. 

Friday, July 21, 2017

ऐ जिन्दगी

ऐ जिन्दगी तूने किया क्यों ये जुल्मो सितम,
हम मज़लूमों को तूने बहुत सताया है…

मैं तनहा यहाँ, वो तनहा कहीं,
हमें जमाने की बहारों से अब लेना क्या …

आज मरने की चाह थी,
पर तूने अरमानो का समां बाँध ललचाया है …

न मरना मुमकिन, न जीने को रहा बाकी कुछ,

तू ही बता ऐ बंदा परवर, हमे/हमारे किन कर्मों की ये सजा अता फ़रमाया है...

Thursday, July 13, 2017

पकड़ की बनावट पर आकार का प्रभाव : एक समीक्षा

जब एक व्यक्ति किसी दिए गए वस्तु को पकड़ने की कोशिश करता है, तो इस पुरे कार्य को दो भागों में बाटा जा सकता है; पहला जिसमे वस्तू के पास पहुंचना होता है, उसे परिवहन कहा जाता है, और दूसरा भाग पकड़ कहलाता है. पूर्व के अध्ययनों के आधार पर यह कहा जाता है की परिवहन वेग घंटी के आकार में बढ़ता-घटता है, पर उँगलियों के शीर्ष के वेग के बारे में कुछ ज्ञात नहीं.


सम्पूर्ण प्रक्रिया = संवेदी+अभिकलन+नियंत्रण






Key Words: Grip, Aperture, Shape, Hand Movement, Neuroscience