मेरा जमीर जागता रहा और सोता रहा भविष्य,
अंदाज जुदा हैं दुनिया के,
संघर्ष है बहुत कठोर,
हर दरवाजे पे दस्तक दी मैनें,
खायीं ठोकरें दर-दर की,
पर सीख न पाया सफलता का वो मूलमंत्र,
जिसे कहते हैं जी हुजूरी का अकाट्य तंत्र।
अंदाज जुदा हैं दुनिया के,
संघर्ष है बहुत कठोर,
हर दरवाजे पे दस्तक दी मैनें,
खायीं ठोकरें दर-दर की,
पर सीख न पाया सफलता का वो मूलमंत्र,
जिसे कहते हैं जी हुजूरी का अकाट्य तंत्र।
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