संक्षिप्त विवरण
नालंदा इतिहास की कक्षाओं के लिये एक जाना पहचाना नाम है, परन्तु यह बड़े दुर्भाग्य कि बात है कि जब भी इसकी चर्चा होती है, तो इसके महत्व का वर्णन अतीत की गहराईयों में होता है, और इसके साथ ही हमारी भारतीय शिक्षा की ऊच्चाईयाँ भूतकाल में गोते लगाने लगती है। हम नालंदा के साथ-साथ बौद्ध धर्म के विश्मृत इतिहास के बारे में सोचने को मजबुर हो जाते हैं।
नालंदा, बिहार की प्राचीन विश्वविद्यालय शहर, का इतिहास हमें छठी शताब्दी ईसा पूर्व में बुद्ध और महावीर के दिनों में वापस ले जाता है। "नालंदा" शब्द का क्या मतलब है, इसके कई संस्करण रहे हैं। नालम को कमल और दा को देना के अर्थ में प्रयोग किया जाता होगा। जैसे कमल ज्ञान के एक प्रतीकात्मक रूप का प्रतिनिधित्व करता है, वैसे ही नालंदा शब्द का मतलब है ज्ञान का दाता माना जाता है। पुरातन साहित्यों के अध्ययनों से पता का चलता है कि नालंदा विश्वविद्यालय गुप्त काल (पांचवीं शताब्दी ई.) के दौरान शुरू किया गया था । उनमें यह भी प्रलेखित किया गया है कि बुद्ध अक्सर नालंदा में रुका करते थे। यह विश्वविद्यालय उस समय के शुरूआती महान विश्वविद्यालयों में से एक था जो आज सिर्फ एक खंडहर के रूप निहित है। लेकिन अभी भी सब कुछ खोया नहीं है। यह फीनिक्स की तरह पुन विकसित हो सकती है।
नालंदा विश्वविद्यालय की स्थापना 427 के लगभग में उत्तर - पूर्वी भारत जो उस समय मगध के नाम से मशहुर था (आज के बिहार राज्य का नालंदा जिला), में किया गया था, जो आज नेपाल के दक्षिणी सीमा से बहुत दूर नहीं है । यह संस्थान सन् 1197 तक विद्यमान रहा और अपने ज्ञान रूपी प्रकाश से पुरे संसार में जगमगाता रहा, साथ ही पुरी दुनियाँ को भी प्रकाशमान् करता रहा । नालंदा, इतिहास में वर्णित महान पैराणिक विश्वविद्यालयों में से एक था। इसे बौद्ध अध्ययन के लिए समर्पित किया गया था, लेकिन यहाँ ललित कला, चिकित्सा, गणित, खगोल विज्ञान, राजनीति के अलावा युद्ध की कला में भी छात्रों को प्रशिक्षित किया जाता था।
यह, आठ अलग-अलग परीसरों, 10 मंदिरों, ध्यान के लिये सभागारों, कक्षाओं, झीलों और पार्कों को समाहित करता, वास्तुशिल्प और पर्यावरण का एक बेजोड़ संगम था। यहाँ नौ मंजिला एक पुस्तकालय भी था जहां भिक्षुओं सावधानी से किताबें और लेखों का प्रलेख तैयार करते थे ताकि सभी विद्वानों के पास उनका अपना अलग - अलग संग्रह हो सके।
संभवत, एक शैक्षिक संस्थान के तौर पर यह प्रथम आवासीय विश्वविद्यालय था, जहाँ 10,000 छात्रों को शयनगृह तथा 2,000 प्राध्यापकों (प्रोफेसरों) के लिये आवास उपलब्ध थे। नालंदा अपने समय का सबसे बड़ा वैश्विक विश्वविद्यालय था, जिसके फलस्वरूप(अपने चरम काल में) यह कोरिया, जापान, चीन, तिब्बत, इंडोनेशिया, फारस और तुर्की से विभिन्न विषयों का अध्ययन के लिये, विद्यार्थियों और विद्वानों को आकर्षित करने में सफल रहा था। यह चीन के बाहर अकेला शैक्षिक संस्थान है जहां कोइ चीनी 17 वीं सदी से पहले अध्ययन के लिए गया था।
ऐसा माना जाता है कि कठोर प्रवेश परीक्षा आयोजित करने वाला यह पहला संस्थान था। इसके पास विश्व स्तर के प्राध्यापक (प्रोफेसरों) भी थे, जिन्होंने गणितीय प्रमेयों और खगोल विज्ञान के क्षेत्र में क्रान्तिकारी काम किया था। इसने कई भाषाओं में धार्मिक ग्रंथों के दुभाषियों और अनुवादकों को भी उत्पन्न किया।
एक शैक्षिक संस्थान के रूप में पुरानी नालंदा पूरी तरह से सीखने-सीखाने के लिए समर्पित था। वास्तव में, यह शैक्षिक उत्कृष्टता के लिए प्रतिबद्ध था, क्योंकि यह बहुत हद तक उस उत्कृष्टता को प्राप्त करने और उसे बनाए रखने में सफल रहा था जिसके कारण नालंदा विदेशी छात्रों को - चीन, जापान, कोरिया और अन्य जगहों से आकर्षित किया करता था। इसकी स्थापना बौद्ध संस्था के तौर पर की गयी थी, लेकिन नालंदा के शिक्षण और अनुसंधान कार्य बौद्ध अध्ययन तक ही सीमित नहीं थे। वास्तव में, धर्मनिरपेक्ष विषयों, जैसे की स्वास्थ्य देखभाल, भाषा विज्ञान, खगोल विज्ञान की पेशकश के लिए भी इसे अच्छी ख्याति प्राप्त थी। नालंदा को हिंदू राजाओं (जैसे गुप्त के रूप में) के साथ साथ बौद्ध राजाओं (जैसे बंगाल के पाल के रूप में) से भी अच्छी तरह से संरक्षण प्राप्त था।
पतन
यह मात्र एक संयोग ही था कि जब पश्चिम के कुछ बड़े विश्वविद्यालयों का इस दुनिया में पादुर्भाव हो रहा था, नालंदा चिर निंद्रा में सोने की तैयारी कर रहा था। भारत में बौद्ध धर्म के प्रति उत्साह का तेजी से ह्रास, भारतीय सम्राटों द्वारा प्राप्त होने वाले वित्तीय सहायता में लगातार गिरावट, साथ ही विश्वविद्यालय के अधिकारियों के बीच बढता भ्रष्टाचार, विश्वविद्यालय का पतन के महत्वपूर्ण कारण थे । अफगानिस्तान से आये मुस्लिम आक्रमणकारियों द्वारा विश्वविद्यालय के भवनों को जलाया जाना और वहाँ कार्यरत बौद्ध भिक्षुओं और छात्रों की हत्या ने इसके ताबूत की आखिरी किल की तरह कार्य किया और इसके साथ ही यह ऐतहासीक विश्वविद्यालय इतिहास के पन्नों में विलीन हो गया।
संर्दभ / REFERENCES
1. Jeffrey Garten, "Really Old School," The New York Times, December 9, 2006.
2. Amartya Sen, "Passage to China," The New York Review of Books, December 2, 2005.
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