Saturday, August 11, 2018

ऐ दिल


इस ज़माने ने, हर शख्स को, बहुत सताया है,
ऐ दिल, ऐ दिल, तू भी इस दुनिया की दस्तूर निभाए जा..

वक्त का पहिया, पहिया..चलता है, चला जायेगा,
ऐ दिल, तू भी इस महफ़िल से गुजर जा..

दुनिया के हैं रंग, हर रंग की है पहचान अपनी,
ऐ दिल, तू भी अपनी पहचान बनाये जा..

Friday, August 18, 2017

बदलाव की डगर

भारत के एक जागरूक नागरिक होने के नाते, भारतीय समाज को जब कोई असहिष्णु कहता है तो मुझे और मेरे जैसे देश के अन्य समान्य जनता को दुःख होता है. कहीं भी कोई घटना हो, तो चाहे न चाहे सभी, उसमें शामिल लोगो की जाति - धर्म जानना चाहते हैं. एक बार ये जानकारी प्राप्त हो जाये, फिर वो निर्णय करते हैं कि अब आवाज उठाया जाय या नहीं. ऐसा नहीं की समाज में ये बदलाव आज आया है, बल्कि ये हमेशा से ही था. एक मनुष्य होने के नाते किसी भी जीवित प्राणी के दर्द को समझने और उसके अनुसार प्रकट करने क्षमता भगवान् ने हमें दी है. पर हम मनुष्यों के बिच हो रही घटनाओं में ही नहीं, बल्कि जानवरों के दुःख में भी भेदभाव करने लगे हैं. किसी को कुत्ता प्यारा, तो किसी को हिरण, तो किसी को कोई और जानवर. हम तार्किक होने के बजाये अपनी-अपनी सोच को आगे बढ़ाना चाहते है. समाज के लिए ऐसी सोच बहुत ही घातक है. वास्तव में हम सभी किसी न किसी मुद्दे के प्रति असहिष्णु हैं और इस सच को स्वीकार कर लेना ही बुद्धिमानी होगी.

मुझे जो दूसरा महत्वपूर्ण मुद्दा लगता है, वो है धर्मनिरपेक्ष और साम्प्रदायिक विवाद. जिन्हें कभी भी अपनी लालच के अलावा किसी और जमीन से जुड़े मुद्दे से सरोकार नहीं रहा, वे अपने को चिन्तकउदार, सहिष्णु और धर्मनिरपेक्ष साबित करने में लगे है. पर जो उनके विचारो से सहमत नहीं, उसे ये पांच सितारा होटलों, बड़े आलिशान बंगलों और महंगे गाड़ियों के साथ शान-शौकत भरी जीवन-यापन करने वाले ये बुद्धिजीवी, बिना झिझक मुर्ख, असहिष्णु और साम्प्रदायिक होने का तमगा थमा देतेहैं. होता इससे भी कुछ नहीं, पर इस देश की गरीब जनता, आम माध्यम वर्ग अपने आप को ठगा महसूस करने लगती है. जिन बुद्धिजीवियों का जीवन इन गरीबों के खून पसीने से चलता है उसे ही ये कीड़ो-मकोड़ो से ज्यादा नहीं समझते.

अभी भी वक्त है, ये बुद्धिजीवी वर्ग संभल जायें, वर्ना जिस देश को हमारे पुरखों ने अपने खून-पसीने से सींच कर, अपने मेहनत के बल पर इस मुकाम पर पहुँचाया है, उसे बिखड़ते देर न लगेगी. 

Friday, July 21, 2017

ऐ जिन्दगी

ऐ जिन्दगी तूने किया क्यों ये जुल्मो सितम,
हम मज़लूमों को तूने बहुत सताया है…

मैं तनहा यहाँ, वो तनहा कहीं,
हमें जमाने की बहारों से अब लेना क्या …

आज मरने की चाह थी,
पर तूने अरमानो का समां बाँध ललचाया है …

न मरना मुमकिन, न जीने को रहा बाकी कुछ,

तू ही बता ऐ बंदा परवर, हमे/हमारे किन कर्मों की ये सजा अता फ़रमाया है...

Thursday, July 13, 2017

पकड़ की बनावट पर आकार का प्रभाव : एक समीक्षा

जब एक व्यक्ति किसी दिए गए वस्तु को पकड़ने की कोशिश करता है, तो इस पुरे कार्य को दो भागों में बाटा जा सकता है; पहला जिसमे वस्तू के पास पहुंचना होता है, उसे परिवहन कहा जाता है, और दूसरा भाग पकड़ कहलाता है. पूर्व के अध्ययनों के आधार पर यह कहा जाता है की परिवहन वेग घंटी के आकार में बढ़ता-घटता है, पर उँगलियों के शीर्ष के वेग के बारे में कुछ ज्ञात नहीं.


सम्पूर्ण प्रक्रिया = संवेदी+अभिकलन+नियंत्रण






Key Words: Grip, Aperture, Shape, Hand Movement, Neuroscience 

Sunday, July 17, 2016

फलसफा

आया है दिन फिर एक बार मेरे जाने का,
असमंजस में हु, इसे क्या कहूँ,
वक्त का तकाजा है, आशियाना बदलने का,
वर्ना एक छत के निचे, गुजार देते हम सारी उम्र........

कुछ मिले, कुछ मिलने वाले हैं,
सब एक-एक करके गुम हो जाने वाले है,
यादे सताती रहती है हर वक्त,
जाने कब, हम ठहरने वाले हैं........

एक-एक करके देख ली सारी दुनिया हमने,
अब न जाने क्या देखने वाले हैं,
जाने कब ये वक्त रुकने वाला है,
जाने कब हम रुकने वाले हैं............

द्वारा – निरज कुमार सिंह

Saturday, January 2, 2016

मेरी हिमाचल यात्रा (दूसरा दिन, मकलॉड गंज और वाटर फाल की यात्रा)


अगली सुबह उठ कर हमलोग नित्य क्रिया से निवृत हुए और स्नान-ध्यान के बाद तैयार होकर जलपान के लिए पुनः बाजार का रुख किया. जलपान में हमें पराठा और दही मिला. उसके बाद मकलॉड गंज जाने को तैयार हुए और बस पकड़ने के लिए वही नजदीक एक चौक पर खड़े हो गए. थोड़ी देर में ही हमें हमरे गंतब्य को ले जाने वाली बस आ गयी. हम सभी उस पर सवार हो गए. इस समय हमलोग एक नयी उर्जा, नया उमंग महशुश कर रहे थे. हमारी बस पहाड़ के घुमावदार रस्ते से होते हुए ऊपर पहाड़ पर चढाने लगी.

यहाँ मैं आपको यह बता दूं की मकलॉड गंज, धर्मशाला जिले में स्थित एक प्रसिद्ध पर्यटन स्थल है जो पहाड़ों की चोटी पर बसा हुआ है. यह मुख्यत बौध धर्मगुरु दलाई लामा का निवास स्थान होने के कारण प्रसिद्ध है. यहाँ एक बौद्ध मंदिर भी है. यहाँ आपको तिब्बती लोग बहुतायत में देखने को मिलेंगे और यहाँ के बाजार में भी तिब्बती और बौद्ध धर्म से जुड़े वस्तुओं की भरमार देखने को मिलेगी.

लगभग आधे घंटे की बस यात्रा के दौरान नयनाभिराम दृश्यों को देखते हुए हम अब मकलॉड गंज बस अड्डे पहुँच चुके थे. सबसे पहले हमने बौद्ध मंदिर जाने की सोची. बाजार होते हुए हम मंदिर पहुंचे, बहुत ही स्वच्छ वातावरण था, वहां की अभूतपूर्व शान्ति ने हमारा मन मोह लिया. भगवान बुद्ध एवं अन्य भद्रजनों की प्रतिमाएं देखकर शरीर रोमांचित हो रहा था. वहीं पूज्य दलाई लामा का निवास स्थल, जो अपने आप में बौद्ध धर्मावलम्बियों के लिए तीर्थस्थल से कम् नहीं है, एक सुखद आश्चर्य से कम नहीं था. धुंध और कोहरे पहाड़ी दृश्यों को पल-पल बदल कर एक अलग ही अनुभव दे रहे थे.

उसके बाद हमने भागसूनाग मंदिर जो कि एक शिव मंदिर है और उसी रस्ते में थोड़ी और आगे स्थित भाग्सू झड़ने जाने का मन बनाया. ऑटो स्टैंड से हमने भागसूनाग मंदिर जाने के लिए ऑटो लिया. वहां पहुंचकर हमने भगवान् शिव का दर्शन किया. अब तक बूंदा-बांदी फिर से शुरू हो चुकी थी. यहाँ पर एक तरन-ताल भी था. समय तो सुबह का ही था परन्तु ठंढ बहुत बढ़ चुकी थी. थोडा समय यहाँ रुकने के बाद हम आगे की ओर बढ़ चले. भागसू झड़ने की तरफ जाने वाले रास्ता हमें पैदल ही तय करना था क्योंकि वहां कोई भी गाड़ी नहीं जा सकता थी. धीरे-धीरे हम उस पहाड़ी रस्ते पर आगे बढ़ने लगे. रस्ते बहुत ही संकड़ा था, उसके एक तरफ पहाड़ तो दूसरी तरफ गहरी खाई थी. झड़ने का पानी निचे एक पतली धारा के रूप में प्रवाहित हो रहा था. बिच-बिच में कोहरे का आना जाना भी लगा हुआ था.

 

बड़ी सावधानी के साथ हम टेढ़े-मेढ़े रस्ते पर चलते हुए झड़ने के पास पहुंचे. यहाँ का नजारा बहुत ही लुभावना था. कुछ लोग झड़ने में जलक्रीडा कर रहे थे. हमने वहा थोड़ी देर समाय गुजारा. कुछ याद स्वरुप तस्वीरें ली फिर वापस चल पड़े. अब तक हम सभी बहुत ही थक चुके थे.
 
मकलॉड गंज वापस लौट बाजार से हम सबने कुछ खरीददारी की. किसी ने शाल, किसी ने थैला, मैंने पीतल की एक प्रतिमा खरीदी. अब हम वापस होटल लौटना चाहते थे. बस स्टैंड आने पर पता चला अभी निचे जाने के लिए बस जाने में देरी है. थोरी दुरी पर हमें एक चर्च दिखा. हमने वो देखने का निश्चय किया और सोचा वही से बस ले लेंगे. चर्च पुराना था. यह एक पुरानी इमारत थी जो बहुत बड़ी तो नहीं पर आकर्षक जरुर थी. उसका स्थापत्या कला मुझे बहुत पसंद आया. चर्च के पिछले हिस्से में जेम्स ब्रूस (viceroy and governor general of India) का कब्र था. 

जब हम यहाँ से चलने को हुए तो तेज बारिश शुरू हो गयी, जिस कारण हमे वही बने एक बस पड़ाव में ठहरना पड़ा. लगभग आधे घंटे के बाद एक बस आ गयी, हम सभी उसपर सवार हो होटल की ओर चल पड़े. जब हम होटल के पास पहुंचे तब  भी बारिश वैसी ही तेज हो रही थी. बस से उतारकर हम सड़क के दूसरी ओर स्थित एक चाय दूकान पर गए. वहां रूककर हम सभी ने चाय पी और हल्का नास्ता किया, तब जाकर थोरी ठंढ कम हुई. अब बारिश भी कम हो चली थी, हम सब होटल आकर विश्राम करने लगे.

विरह वेदना



आश हम लगवले बानी, पिया परदेशिया से
जाने कब अईन्हे, उ दूर विदेशवा से
लइहें कउनो सौतिन, की कउनो उपहारवा
सोची-सोची, मनवा तरपेला हो रामा।

कौना जनमवा में, पाप हम कैईनी
अपना बालम जी के, विदेश हम पठइनी
एक बार आ जास त, फेर ना जाई देहेब
केशुवन के जाल में, फंसा के रख लिहब ।

नैनं के तीर से, बच नाही पइहें,
छन-छन पाव के घुंघरू बजायेब,
नाची-नाची, उनकर मन बहलायेब,
पर सखी, जाये नाही देहेब फेरु उनका के विदेशवा हो रामा,
चाहे करे के परे कौनो जतनवा हो रामा।
                          
मंदिर जायेब, मस्जिद जायेब,
गिरिजाघर और गुरूद्वारे जायेब,
सब दरवाजवा प, अलख जगायेब,
माथा अपन पटकत-पटकत जानी देइ देहब,
पर भगवान जी से एकेगो आशीष हम लिहब,
जब तक जीई हम उ रहस हमरा पास,
हमरो त अर्थिय उठे उनके हाथ........
हमरो त अर्थिय उठे उनके हाथ........

निरज कुमार सिंह
छपरा