ऐ जिन्दगी तूने किया क्यों ये जुल्मो सितम,
हम मज़लूमों को तूने बहुत सताया है…
मैं तनहा यहाँ, वो तनहा कहीं,
हमें जमाने की बहारों से अब लेना क्या …
आज मरने की चाह थी,
पर तूने अरमानो का समां बाँध ललचाया है …
न मरना मुमकिन, न जीने को रहा बाकी कुछ,
तू ही बता ऐ बंदा परवर, हमे/हमारे किन कर्मों की ये सजा अता फ़रमाया है...
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