आश हम लगवले बानी,
पिया परदेशिया से
जाने कब अईन्हे, उ
दूर विदेशवा से
लइहें कउनो सौतिन,
की कउनो उपहारवा
सोची-सोची, मनवा तरपेला
हो रामा।
कौना जनमवा में, पाप
हम कैईनी
अपना बालम जी के,
विदेश हम पठइनी
एक बार आ जास त, फेर
ना जाई देहेब
केशुवन के जाल में,
फंसा के रख लिहब ।
नैनं के तीर से, बच
नाही पइहें,
छन-छन पाव के घुंघरू
बजायेब,
नाची-नाची, उनकर मन
बहलायेब,
पर सखी, जाये नाही
देहेब फेरु उनका के विदेशवा हो रामा,
चाहे करे के परे कौनो
जतनवा हो रामा।
मंदिर जायेब, मस्जिद
जायेब,
गिरिजाघर और
गुरूद्वारे जायेब,
सब दरवाजवा प, अलख
जगायेब,
माथा अपन पटकत-पटकत
जानी देइ देहब,
पर भगवान जी से
एकेगो आशीष हम लिहब,
जब तक जीई हम उ रहस
हमरा पास,
हमरो त अर्थिय उठे
उनके हाथ........
हमरो त अर्थिय उठे
उनके हाथ........
निरज कुमार सिंह
छपरा
Ek no dada.....Chha gaye
ReplyDeletethanks bhai ji
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