Saturday, December 6, 2014

याद


हमरा दुवारवा पे रहे एगो गछिया
ओहिमे भुलाइल रहे हमरो त दुनिया
ओहिसे त फल मिले अउर मिले छाया
अठमी में झूली सन ओहिपे झुलवा

आज जब देखतानी गछिया न लौके
खाली जमीनिया के देखि जिया तरपे
जैसे कौनो आपन पुरनिया से बिछर के

गछिया कटाइल की कटाइल हमार देहिया
एक-एक करीके झरे लागल पतवा
पतवा ह की, ह इ सम्बन्धवा
एहे लागटाते अब दुनिया के रितवा

रोज केहू आपन बिछरत इंहा बाटे
सांस लियाता पर जिए के ललक छुटताटे
बनत बनी मशीन, सुन ए सनेहिया
बुत बने के पहिलेके एहे ह कहनिया...

बुत बने के पहिलेके एहे ह कहनिया... 

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