Saturday, August 16, 2014

सन्नाटे का श्मशान

हम निकले हैं उस दौर से,
जब जनाजों को होड़ थी,
कोलाहल था पैर पसारे,
सन्नाटे बन गए थे जीवन स्तंभ ।

अगर आज मैं हिम्मत कर, अपने आस-पास निहारता हूँ,
कोलाहल को, और भी करीब आता पाता हूँ,
रिश्ते - नातों की डोर पकड़ के, जब कुछ दूर आगे जाता हूँ,
सन्नाटे की श्मशान में, खुद को अकेला पाता हूँ ।

फिर याद आता है, वो जनाजों का दौर,
वो हँसता है, मुस्कुराता है,
हमारे जनाजे बन जाने पर, ठहाके लगाता है,
आती है, एक आवाज दूर से,
“वो जनाजों का दौर था और आज हम खुद जनाजे बन गए हैं”


द्वारा -  निरज कुमार सिंह 

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