सुनो मेरे मोहन प्यारे
बिनती करुँ मैं, कर जोरी के.......
तुम वन-२ बंशी बजाते,
मैं भटकूँ चहुँ ओर
रे....
सुनो मेरे मोहन प्यारे
बिनती करुँ मैं, कर जोरी के.......
माखन खाये, गइया चराये
मेरी इक ना स्वप्न
सजाये
हे मुरलीधर, बृज के कान्हॉ
रखो मेरी लाज रे ...
सुनो मेरे मोहन प्यारे
बिनती करुँ मैं, कर जोरी के.......
हरे-भरे जंगल हैं लेकिन, वृन्दावन की छाव नहीं है
कलकल करती नदियाँ हैं पर, उनमें वो (यमुना सी) मिठास
नहीं है
दया करो हे जग के रखवाले
सब कुछ कर दिया अब तुम्हरे हवाले
दरश दिखावो, जादू चलाओ
पूरी करो मेरी फरियाद रे......
सुनो मेरे मोहन प्यारे
बिनती करुँ मैं, कर जोरी के.......
आज हुई है धन्य वसुंधरा,
चरण तुम्हारे जो इस पर परे हैं,
पुलकित हुआ है कोना-२, रोम-२ मुस्काने लगा है,
सदा रहो कृपालु वो गिरधर, दृष्टी हमपे बनाई के...
सुनो मेरे मोहन प्यारे
बिनती करुँ मैं, कर जोरी के.......
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