Tuesday, May 28, 2013

लक्ष्य और उसके प्राप्ति के साधन



पथ पर कब तक अडिग रहें यह प्रश्न बार-2 मन को कचोटता है। जब भी दिल से यह विचार मानस पटल पर आता है, एक किंकर्तव्यविमुढ की सी स्थिति पैदा हो जाती है।
आरंभ में हर मानव एक सुनहरे जीवन की तस्वीर बनाता है और उसे मूर्त रूप देने में जी जान से जुट जाता है। पर समय के थपेड़े या तो उन्हें पूर्णतया नष्ट कर देते है या उनके स्वरूप को बदल देते हैं। विरला ही कोई अपने स्वप्न को यथावत् मूर्त रूप देने में सफल हो पाता है। इस प्रक्रिया के दौरान मनुष्य अर्द्धनिद्रा का शिकार भी होता है, तो कभी-2 उसके मन-मस्तिष्क में यह भी ख्याल आता है कि उसने यह स्वप्न देखा ही क्यों? मूलतः वह यह सोचता रहता है की उसने जो ख्वाब देखा या देख रहा है, उसके काबिलियत से कहीं ज्यादा तो नहीं, कहीं वह गलत रास्ते पर तो नहीं बढ रहा। इस अंजान रास्ते में जिसके लक्ष्य के प्रति भी वो आश्वस्त नहीं हैं, उसमें उसे कहाँ मोड़ लेना है और कहाँ पूर्णविराम लगाना है, जानने का दुष्कर कार्य करता रहता है, और हर वक्त साधारणतया असफल होता है।
समय के साथ जब लक्ष्य बदल जाता है तब भी वो निश्चिन्त नहीं हो पाता कि नया लक्ष्य सही है या वो पुराने लक्ष्य को अब भी पा सकता है या भविष्य के हिसाब से उसे कोई अन्य लक्ष्य निर्धारित करना चाहिए ?
कुहासे से भरी रात में जब आप मध्य सड़क पर खड़े हों, रोशनी जलाने के बाद भी अपने आप को एक कदम से ज्यादा का फासला देखने में असमर्थ महसूस करते हों तब आपके लिये सड़क की दिशा को जान पाना मुश्किल हो जाता है।
आज के हमारे कुछ युवा साथी यह सुझा सकते हैं की तकनीक जैसे की मोबाइल पर उपलब्ध GPS का प्रयोग कर वो सही दिशा जान सकते हैं। पर उनके लिये मैं यह कहूँगा की मान लिजिये कि आप किसी ऐसे स्थान पर हैं जहाँ बिजली उपलब्ध नही है जैसा कि पहाड़ी इलाकों में अक्सर होता है, इस कारण आपके मोबाइल की बैटरी डिस्चार्ज हो गई और आप असहाय। यह भी संभव है की मोबाइल की बैटरी पूरी तरह चार्ज हो पर टावर की पहुँच से बाहर हैं। इन दोनों दशा में आप अपने को तकनीक के बावजूद असहाय पायेंगे। अतः आप सभी से मेरा अनुरोध है कि आप अपने ज्ञानेंद्रियों को जागृत करें, मन-मस्तिष्क को झकझोरें शायद कोई उत्तर मिल जाये।
आइये एक बार फिर अपने पुराने प्रश्न की ओर लौटते हैं। कुछेक लोग मुख्य लक्ष्य की प्राप्ति के दौरान आनेवाले चरणबद्ध लक्ष्यों की सफल प्राप्ति पर ही अपने को सफल मान मुख्य लक्ष्य को भूल जाते हैं और ठहर कर आनंदोत्सव में जुट जीवन-यापन करने लगते हैं, वहीं कुछेक जिनकी दृष्टि गिद्ध की तरह तीक्ष्ण है वो निरंतर प्रयत्नशील रहते हैं। इसके बावजूद भी यह निश्चित तौर पर नही कहा जा सकता की ये अपने लक्ष्य को पा ही लेंगे।
याद रखें नदियाँ सतत् प्रयास के द्वारा ही अपने गंतव्य को प्राप्त करती हैं। अतः दृढ निश्चय और ईमानदारी के साथ सतत् प्रयास ही सफलता का मूल मंत्र है।
निरज कुमार सिंह
niraj491985@gmail.com

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