Thursday, February 28, 2013

बसंत



लो आ गई बसंत, छायी बहार...
प्रकृति कर रही अपनी श्रृंगार,
लाल, हरे और पीले, नीले,
ऋतुओं ने हैं सब रंग बिखेरे।
मंद-2 चलती बयार,
कल-2 करता ये नद-संसार।
पक्षियों की चहचहाहट में,
सिंह की गरजती दहाड़।
लो आ गई बसंत, छायी बहार...

पेड़ों पर कलियाँ लगीं हैं आने,
हरियाली का कंबल ताने,
आम्रमंजरी की सुगंध से,
भ्रमरों के दिल लगे हैं गाने।
कहीं कोयल की कू-2 है तो,
कहीं पपीहे की पीं-2,
ऐसा लगता है मानों,
धरती लगी है मुस्कुराने।
लो आ गई बसंत, छायी बहार...

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