Friday, October 2, 2009

भरत और खेती

जब जाता हूँ जौ की खेतों में,
हरा हो जाता हूँ , हवाओं के साथ,
खाने वाले खाने वाले खैनी खाके, खेलने लगते है खेतों में,
घरों में घुसते, घरों की घरघराहट से, घबरा जाते हैं घुमने वाले,
मनमोहक मन को मोहने वाली, मोहिनी मन को मोहने लगी,
भोर भये भारत में, भरत को भ्रांतियाँ होने लगी।

2 comments:

  1. I think now you are a poet and social thinker.... good , keep it up.

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