Wednesday, November 18, 2009
हिन्दी भाषा का विज्ञान और तकनीक के क्षेत्र में प्रयोग
“भारतवासियों अंग्रेजी सिखो, लेकिन अंग्रेजीयत मत सिखो”
लेकिन आज के समय में हम अंग्रेजी के साथ -२ अंग्रेजीयत भी सीखते जा रहे हैं। जिसका परिणाम यह है कि हम अपने देश की सभ्यता और संस्कृति को भूलते जा रहे हैं और पश्चिमी सभ्यता को अपनाते जा रहे हैं। यदी हम तकनीकी क्षेत्र में रहते हुए भी अपनी मातृभाषा को सम्मान देते हैं तो ये हमारे लिये गर्व की बात होगी। तकनीकी क्षेत्र में रहकर यदी हम हिन्दी को भूल जायें तो सेवा क्षेत्र में हमें बहुत सी कठिनीइयों का सामना करना पड़ेगा। क्योंकि आज भी भारत की बहुत सी जनता हिन्दी ही जानती है और यदी हम तकनीकी क्षेत्र में सेवारत हैं तो ऐसे लोगों से वार्तालाप आदि में समस्या उत्पन्न हो सकती है। अगर हमारे देश के तकनीशियन जो दूसरे देशों में कार्य कर रहे हैं, हिन्दी में वार्तालाप आदि करें तो इससे हिन्दी के प्रचार-प्रसार को बढावा मिलेगा तथा दूसरे देशों के लोग भी हमारी भाषा से वाकिफ हो सकेंगे। हिन्दी भाषा का विज्ञान और तकनीक के क्षेत्र में प्रयोग के बहुत सारे फायदे हैं, इसके कुछ समस्यायें भी हैं और इन समस्यायों के समाधान भी हैं। अब एक-२ करके इन सभी पर नजर डालते हैं -
लाभ - तकनीकी क्षेत्र में जब भी हिन्दी के प्रयोग की बात चलती है,तो इसे स्वदेश, सभ्यता तथा संस्कृति से प्रेम के रूप में ज्यादा देखा जाता है। इसके प्रयोग से होने वाले अऩ्य लाभों की अनदेखी कर दी जाती है जो निम्न हैं –
१. सभी को समान अवसर। विज्ञान तथा तकनीक को कम समय में तथा आसानी से सीखा जा सकता है। र्वतमान समय में इस क्षेत्र में आगे बढने के लिये अंग्रेजी भाषा की जानकारी होना ही पर्याप्त नहीं है, बल्कि उस पर अधिकार होना भी आवश्यक है। अतः विद्यार्थी एक लंबा समय अंग्रेजी भाषा को सीखने में ही लगा देते हैं। गॉवों में इस भाषा को सीखने के लिये उपयुक्त माहौल भी नहीं है, अतः ग्रामीण विद्यार्थियों को तो और भी परेशानी का सामना करना पड़ता है। समान्यतः विद्यार्थी इन विषयों को सीखने में जो क प्रकार की अरूचि दिखाते हैं,उसका एक कारण ये भी है। अगर विज्ञान एवं तकनीक की शिक्षा हिन्दी में दी जाऐ तो विद्यार्थियों के लिये ये विषय अधिक सुग्राह्य होंगे।
२. ग्रामीणों को तकनीक(मुख्य धारा) से जुड़ाव। महात्मा गाँधी ने कहा था की राष्ट्रभाषा का पद प्राप्त करने का अधिकार हिन्दी भाषा ही रखती है। यह बात उन्होंने इसलिये कही थी, क्योंकी अधिकांश भारतीय हिन्दी आसानी से लिख, बोल सकते हैं। अगर विज्ञान एवं तकनीक के क्षेत्र में हिन्दी का प्रयोग हो तो यह सुदूर ग्रामीण क्षेत्रों तक आसानी से पहुँच सकती है। अभी भी ग्रामीण क्षेत्र तथा बहुसंख्यक आम जनता विज्ञान तथा तकनीक से नहीं जुड़ सका है, खासकर किसान वर्ग। विज्ञान तथा तकनीक से जुड़ने पर उनका जीवन स्तर ऊँचा होगा।
३. आत्मनिर्भरता
४. स्वाभिमान का बोध
५. तकनीकी क्षेत्र में हिन्दी के प्रयोग से भारतीय प्रतिभाओं के पलायन पर भी कुछ हद तक रोक लगाया जा सकता है। इसके जिते-जागते उदाहरण के तौर पे आप चीन को ले सकते हैं।
समस्यायें – तकनीकी क्षेत्र में हिन्दी के प्रयोग से बहुत सारे लाभ तो हैं, पर इस पहल की राह में अनेक समस्यायें भी हैं, जो इस प्रकार हैं -
१. अंग्रेजी भाषी बनने पर ज्यादा प्रतिष्ठा पाने का भ्रम।
२. हिन्दी में पर्याप्त अध्ययन सामग्री का अनुउपलब्धता और जो कुछ अध्ययन सामग्री उपलब्ध है उनमें भी अंग्रजी के तकनीकी शब्दों का अनुवाद कुछ इस तरह से किया गया है कि भाषा कुछ ज्यादा ही कठीन हो गई है।
३. हिन्दी में पढाने वाले योग्य शिक्षकों का अभाव। चूकि ये शिक्षक भी लंबे समय से अंग्रजी में ही इन विषयों को पढाते आ रहे हैं तथा उन्होंने भी इन सभी विषयों की शिक्षा अंग्रजी में ही प्राप्त की है, अतः हिन्दी में पढाना उनके लिये भी परेशानी का सबब है।
४. हिन्दी में शिक्षा देने वाले पर्याप्त शिक्षण संस्थाओं का अभाव।
५. ज्यादतर कंपनीयाँ बहुराष्ट्रीय इसलिये तत्कालीन समय में हिन्दी में तकनीकी शिक्षा प्राप्त लोगों के लिये रोजगार की समस्या। कंपनियाँ अंग्रजी में तकनीकी शिक्षा प्राप्त करने वालों को ही नियुक्त करती हैं ऐसे में हिन्दी माधयम से शिक्षा प्राप्त करने वालों के लिये एकमात्र विकल्प सरकारी नौकरियाँ ही होती हैं जिन्हे प्राप्त करने के लिये पहले से ही मारामारी चल रही होती है।
६. स्वस्थ मानसिकता तथा दृढ इच्छाशक्ति का अभाव। अभिभावकों तथा विद्यार्थियों में यह बीमार मानसिकता घर कर गई है कि हिन्दी में शिक्षा प्राप्त करना अंग्रजी के मुकाबले हीन है। समाज भी हिन्दी में तकनीकी शिक्षा प्राप्त करने वालों को कमतर ही आँकता है, भले ही वह कितना भी तेज व कुशल क्यों न हो।
सुझाव – अतः तकनीकी क्षेत्र में हिन्दी के प्रयोग को प्रोत्साहित करने के लिये एक स्वस्थ मानसिकता के साथ प्राथमिक स्तर से ही प्रयास करने की आवश्यकता है। जैसे कि –
१. तकनीकी क्षेत्रों में हिन्दी का व्यापक इस्तेमाल।
२. हिन्दी भाषा में तकनीकी पुस्तकों या शोध पत्रों का लेखन एवं कुशल अनुवादकों की बड़ी संख्या में व्यवस्था जिससे कि वो तकनीकी पुस्तकों का सरल हिन्दी भाषा में अनुवाद कर सकें, अनुवाद करते वक्त इस बात का खास ध्यान रखा जाय की भाषा क्लिष्ट ना हो यानी सुग्राह्य हो। अखिल भारतीय तकनीकी परिषद् ने ऐसे अनुवादकों को प्रोत्साहित करने के लिये धन की भी व्यवस्था की है। हिन्दी भाषा में इन विषयों को लिखने का हमारा मकसद इसे साधारण जनता तक पहुँचाना है।
३. हिन्दी भाषा में शोध कार्य करने वालों के शोध कार्यों को समान्य जनता तक पहुँचाने के लिये हिन्दी भाषा में प्रतिष्ठित शोध पत्रिका का होना अतिआवश्यक है, ताकि यदी कोई हिन्दी में अपने शोध पत्र लिखता है तो उसका मुद्रण आसानी से हो सके।
४. हिन्दी में तकनीकी शिक्षा देने वाले शिक्षण संस्थानों तथा योग्य शिक्षकों के एक बड़े खेप की व्यवस्था करना। निजी शिक्षण संस्थान व्यवसायीक नजरिया अपनाये हुए हैं, वे अधिक से अधिक विद्यार्थियों को आकर्षित करने के लिये उन्हें विदेशी कंपनियों में नौकरी का प्रलोभन देते हैं जिसके लिए अंग्रेजी माध्यम में शिक्षा प्राप्त करना जरूरी है। अतः वो अंग्रेजी माध्यम में शिक्षा देते हैं। सरकार को ही हिन्दी में तकनीकी शिक्षा देने वाले शिक्षण संस्थानों तथा शिक्षकों की व्यवस्था करनी होगी। ये शिक्षण संस्थान उन विद्यार्थियों के लिये वरदान साबित होंगे जिन्होंने अपनी प्रारंभिक शिक्षा हिन्दी में प्राप्त की है और उच्च शिक्षा की आकांक्षा रखते हैं। यही नहीं ऐसे शिक्षण संस्थान तकनीकी कौशल प्रदान करने वाले कार्यक्रमों को ग्रामीण स्तर पर चलाकर, गॉवों को तकनीकी शिक्षा से जोड़ने में निश्चिय ही मदद कर सकते हैं।
५. तकनीकी एवं अतकनीकी सभी शिक्षण संस्थाओं में हिन्दी का एक अनिवार्य विषय लागु करना, साथ ही साथ हिन्दी के विभिन्न प्रतियोगिताओं (जैसे कि निबन्ध एवं कविता लेखन, भाषण प्रतियोगिता, वाद-विवाद प्रतियोगिता इत्यादी) एवं कार्यक्रमों का आयोजन ताकि तकनीकी क्षेत्रों में शिक्षारत एवं कार्यरत लोगों को हिन्दी का अच्छा ज्ञान हो और उनकी इसमें रूचि भी बनी रहे।
६. तकनीकी जगत को हिन्दी में कामकाज करनेवालों के लिये रोजगारपरक बनाना ताकि इन शिक्षण संस्थानों में पढने वाले विद्यार्थीयों को उचित रोजगार मिल सके।
७. हिन्दी में कामकाज करनेवालों को हिन्दी में ही संसाधन तथा अधिकाधिक सुविधा मुहैया कराना।
८. देश की समृद्धी एवं विकास के लिये दृढ संकल्प लेना।
हिन्दी सिर्फ भारत में ही नहीं बल्कि विश्व के अनेक देशों जैसे की नेपाल, पाकिस्तान, फिजि, मॉरिशस, सुरीनाम, त्रिनिदाद, टोबागो और गुयाना इत्यादि में भी बोली जाती है। बोलने वालों की संख्या के आधार पर हिन्दी, चाइनीज और अंग्रेजी बाद तीसरे पायदान पर है। अंग्रेजी और हिन्दी बोलने वालों की संख्या में बहुत ही कम का अंतर है, यहाँ तक की कुछ ही समय पहले हिन्दी दूसरे पायदान पे थी। इन सब के बावजुद भी आज हम उनके लिये स्रोत हैं और वे मंजिल। पर क्या हम उनके लिये मंजिल नही बन सकते ? हमारे पास उम्दा संसाधन है, हम एक बहुत ही बड़ा बाजार भी हैं और आज के दौर में दुनियाँ उन्हीं के पिछे जाती है जिनके पास ये सब हों,फिर हम क्यों इसका फायदा उठाने में असफल हो रहे हैं ? कोकाकोला, जोकि एक विदेशी कंपनी है, के विज्ञापन “ये दिल मांगे मोर” में “दिल मांगे” इसीका जीता-जागता उदाहरण है। विदेशी लोग सदा से ही हिन्दी में उपलब्ध हमारे पुस्तकों का अध्ययन कर अपने अनुसंधान कार्य को नयी दिशा देते रहे हैं और अपने समाज को समृद्ध करते रहे हैं। इसके लिए वे हमारे पुस्तकों का अपने भाषा चाहे वो अंग्रेजी, फ्रेंच या जर्मन हो में अनुवाद करते रहे हैं। परन्तु हमने एक भेड़-चाल आरंभ कर दी है, वो भी उनके पीछे जो हमारे कारण ही समृद्ध हैं।
इसका कारण कोई और नहीं बल्कि हम खुद ही हैं। आजादी के ६०-६२ बर्षों बाद भी हम हिन्दी को अपने ही देश में वो स्थान नहीं दिला सके हैं जिसकी वो वास्तव में हकदार है। वोट बैंक के लिये हम हर साल १-२ नयी भाषाओं को संविधान की आठवीं अनुसुची में शामिल करावा देते हैं और हमारी हिन्दी अपने भाग्य पे आँसु बहाने को मजबुर हो जाती है। हिन्दी को उसका खोया हुआ स्थान दिलाने के लिये हमें आज के युवा पीढी में इसके प्रति सम्मान की भावना जगानी होगी, जोकी अंग्रेजी के छलावे के आगे लुप्तप्राय हो रही है। इसे रोजगार प्रदत बनाना होगा और ये तभी संभव है जब हिन्दी को तकनीकि शिक्षा का मुख्य अंग बनाया जाय साथ ही साथ हमारे अनुसंधान कार्य भी इसी में हों। rafter.com, bhasaindia.com जैसे नये विकसीत वैबसाइटें ईनटरनेट के क्षेत्र में हिन्दी को व्यवहारिक भाषा बनाने की तरफ लोगों का ध्यान आर्कषित करने का सफल प्रयास कर रहे हैं। www.raftar.com, जो की हिन्दी से पुरी तरह से जुड़ी हुई (Integrated), भारत की पहली खोज यंत्र (Search Engine) मानी जा रही है एवं प्रबोधक (Monitor) में ही कुंजापटल (Key-Board) मुहैया करा रही है। साथ ही साथ यह तत्कालीक मुख्य समाचार, सजीव क्रिकेट जगत के अंक (Score) इत्यादि भी मुहैया कराती है। जब अमेरीका अपने लोगों के हिन्दी एवं चाइनीज सीखने को बाध्य कर रहा है तब हमलोग भारत में ही विदेशी भाषाओं की तरफ ज्यादा क्यों झुके हुए हैं ? समय आ चुका है जब हम अपने सर्वथा महत्वपूर्ण राजभाषा के महत्व को समझे और इसके पतन को रोकें और राष्ट्रभाषा का दर्जा दिलाने का प्रयास करें।
जय हिन्द
जय हिन्दी
Sunday, November 1, 2009
सांस्कृतिक और साम्प्रदायिक समन्वय की भूमि हरिहर क्षेत्र
यद्यपि सोनपुर का उल्लेख वैदिक काल से लेकर शुंगकाल सोनपुर का उल्लेख अस्पष्ट है। शोधार्थियों के अनुसार चीनी यात्री फाटयान और यूनानी राजदूत मेगास्थनीज की डायरी से स्पष्ट होता है कि वर्तमान सोनपुर उक्कवेलपुर नाम से प्रसिद्ध था। भगवान बुद्ध ने उक्कवेलपुर सोनपुर में अपनी अमृतवाणी और उपदेश की वर्षा की थी। लोक प्रचलित मान्यताओं के अनुसार वर्तमान हाजीपुर हरिपुर का विदेशज रूप है। भक्त कवि हृदय राम का एक पत्र नाभा दास के नाम से स्पष्ट है कि संवत 1626 में हरिहर क्षेत्र मेला लगा था।
चित्रकुट से चलिकै तुलसी हरिपुर आयो से स्पष्ट है कि हाजीपुर का नाम हरिपुर था। रमचौड़ा मंदिर और तुलसी बाड़ी गोस्वामी तुलसी दास की स्मृतियों को संजोए हुए है। हाजीपुर स्थित गोस्वामी की स्मृतियों की पुष्टि 1913 में मेहापंडित राहुल सांस्कृत्यायन ने स्वयं पहुंचकर की थी। संभवत: राजा शिव सिंह एवं हाजी इलियास के वंशज हुसैन शाह के बीच संग्राम में राजा की पराजय के बाद हरिपुर का नाम हाजीपुर हो गया हो।
हाजीपुर हरिपुर और हरपुरनंद परमानंदपुर स्टेशन दोनों के मध्य स्थित सोनपुर वैष्णव और शैव मतावलंबियों की संधि भूमि है। इतिहासकारों ने जैन, बौद्ध, नानक और कबीरपंथ, नाथ पंथ आदि पथों की समन्वय भूमि के रूप में सोनपुर को परखा है। यद्यपि हरिहर क्षेत्र मेला का आरंभ 1822 से माना जाता है। 1860 ई. में लार्ड मार्टिन के आदेशानुसार प्राचीन हरिहर नाथ मंदिर का सौंदर्यीकरण व विस्तार के साथ सोनपुर एशिया प्रसिद्ध पशु मेला के रूप में मानचित्र पर आया। यद्यपि पशु मेले का आकर्षण धीरे-धीरे समाप्त होता जा रहा है। अब हाथी न आ रहे है और बिक रहे हैं। फिर भी कार्तिक पूर्णिमा पर स्नान और बाबा हरिहरनाथ का जलाभिषेक हेतु पुण्य भूमि सोनपुर पूरे अगहन मास भक्तों से भरी पड़ी रहती है।
Friday, October 16, 2009
हैप्पी दीपावली


"Since the light of knowledge is gone, we will make light of ordinary matter" ("गये से भवुज्जोये, दव्वुज्जोयं करिस्समो")
ततस्तुः लोकः प्रतिवर्षमादरत् प्रसिद्धदीपलिकयात्र भारते |
समुद्यतः पूजयितुं जिनेश्वरं जिनेन्द्र-निर्वाण विभूति-भक्तिभाक् |२० |
The gods illuminated Pavanagari by lamps to mark the occasion. Since that time, the people of Bharat celebrate the famous festival of "Dipalika" to worship the Jinendra (i.e. Lord Mahavira) on the occasion of his nirvana
Friday, October 2, 2009
भरत और खेती
हरा हो जाता हूँ , हवाओं के साथ,
खाने वाले खाने वाले खैनी खाके, खेलने लगते है खेतों में,
घरों में घुसते, घरों की घरघराहट से, घबरा जाते हैं घुमने वाले,
मनमोहक मन को मोहने वाली, मोहिनी मन को मोहने लगी,
भोर भये भारत में, भरत को भ्रांतियाँ होने लगी।
science and technology
(From Eight point Oath given by Dr. A. P. J. Abdul Kalam)
As we now-a-days always talk about profit and loss; so I want to ask a question; what science and technology will give us? The answer of this very question is hidden in this editorial. Friends S&T give us a vision which eliminates all limitations and boundaries and it provides answers to challenging problems and solves mysteries. We have to always remember and take inspiration from some of our old and new jewels like Aryabhata, Bhāskara, Brahmagupta, Varahamihira, Sir CV Raman the discoverer of Raman effect, Chandrasekhar Subramanyam, discoverer of Chandra limit and black hole, Srinivasa Ramanujam the number theory originator.
For illustration, if we take our human body. What is the human body? Science has revealed that the human body is made up of millions and millions of atoms. An average adult weighing 70 kilograms would have approximately 7 atoms, (i.e., 7 followed by 27 zeros). This is divided into 4.7 would be hydrogen atoms, another 1.8 would be oxygen, and there are 7.0 carbon atoms. The difference between one human being and another is determined by the sequencing of the atoms. The recent human genome programme reveals that human genome contains 23 pairs of chromosomes, which lie in the nucleus of every cell in the body. Each chromosome consists of a DNA double helix that is wrapped around spool like proteins called histones. It is estimated that the human body has three hundred thousand to 2 million proteins. The characterization of each protein is the most challenging task, which is carried out by the Human Proteome Project. The unraveling of the genomic mystery will ultimately allow the bio-medical community to create a new evolutionary future for the human race. So far, I have highlighted how the scientific minds have explored space, environment and human biological system.
As time has passed our requirements has increased. To fulfill them we need resources which are available in limited amount. So what we can do now? The best way out is harnessing and utilization of resources be done in more proper manner. For this we need a high class technology. So if we want our nation on world map and if we want to lead then we must have to produce world class technology. It would be accomplished only if each and every people would be literate and be able to use these technologies, it being equally important that all these technologies must reach to our people who are living in very remote areas, usually unaware of the contemporary developments.
World is celebrating this year as International year of Astronomy on the completion of 400 years of Galileo’s remarkable discovery i.e. Telescope. We have to understand the meaning of this. As our population is increasing geometrically day by day, we need more space and more resources. So we must have to acquire distant and different galacticle objects to fulfill them. For this we have to create awareness in people regarding S&T. Preservation and restoration alongside recitations of our old S&T is necessary because they are the foundation stone for our further developments in this area. We have to try to roll S&T in action not only for learned rather a daily or routine commodity for the aloof and veiled.
Discovery in science provides the greatest satisfaction and happiness to the individual scientists. All scientists probably never thought of the magnitude of the application of their discoveries at the time they discovered it. The nuclear energy, light spectroscopy, calculation of the life of the sun, all was understood subsequently due to these scientific discoveries. The science leads to development of technologies. Availability of technologies leads to products. It should be the mission of our budding scientists to see that they make scientific discoveries, which will lay the foundation for future technologies of the country leading to new cost effective products for our billion plus people, and also increasing the wealth of the nation.
Saturday, September 26, 2009
हिन्दी भाषा में विज्ञान और तकनीक लेखन का महत्व
हमारे गाँवों, छोटे शहरों यहाँ तक की बड़े शहरों के भी अधिकांश विद्यालयों (एवं विश्वविद्यालयों) में हिन्दी का प्रयोग होता है। हमारे ज्यादातर शिक्षक, विद्यार्थीयों के साथ ज्ञान का आदान प्रदान भी हिन्दी में ही करते हैं। १० वीं कक्षा तक हमारे सारे विषयों के किताब भी अभी तक हिन्दी में ही उपलब्ध हैं। और आगे की पढाई के लिए जब ये बच्चे शहरों की तरफ रुख करते हैं तो उन्हें नये माहौल, नई शिक्षा पद्धती और अपने भविष्य की चिंता होती है, जो सिर्फ इस कारण और भी ज्यादा बढ जाती है क्योंकि उन्हें अब अपना माध्यम भी बदलना होता है । यदि अब उन्हें गणित,भौतिकी या रसायन शास्त्र पढना है तो उन्हें इन विषयों से ज्यादा अंग्रेजी भाषा पर ध्यान देना पड़ता है, क्योंकि अब सारे विषयों के किताब हिन्दी मे न होकर अंग्रेजी भाषा में उपलब्ध होते हैं। यदि हम उन्हें उनके विषय संबंधी अच्छी पुस्तकें हिन्दी में उपलब्ध करा सकें तो निश्चय ही वे उस पर ज्यादा पकड़ बनाने में कामयाब होंगे, जो की दुसरी भाषा के कारण नहीं हो पा रहा था। इस संबंध में दुसरे देशों जैसे रुस, जापान, चीन या फ्रांस को हम उदाहरण के तौर पे ले सकते हैं, जिन्होंने अपनी स्थानीय भाषाओं के बल पे, अपने को दुनिया के उन गिने चुने अग्रणी देशों के कतार में ला खड़ा किया जिनके पीछे आज सारी दुनिया खड़ी है ।