आया है दिन फिर एक बार मेरे जाने का,
असमंजस में हु, इसे क्या कहूँ,
वक्त का तकाजा है, आशियाना बदलने का,
वर्ना एक छत के निचे, गुजार देते हम सारी उम्र........
वक्त का तकाजा है, आशियाना बदलने का,
वर्ना एक छत के निचे, गुजार देते हम सारी उम्र........
कुछ मिले, कुछ मिलने वाले हैं,
सब एक-एक करके गुम हो जाने वाले है,
यादे सताती रहती है हर वक्त,
जाने कब, हम ठहरने वाले हैं........
सब एक-एक करके गुम हो जाने वाले है,
यादे सताती रहती है हर वक्त,
जाने कब, हम ठहरने वाले हैं........
एक-एक करके देख ली सारी दुनिया हमने,
अब न जाने क्या देखने वाले हैं,
जाने कब ये वक्त रुकने वाला है,
जाने कब हम रुकने वाले हैं............
अब न जाने क्या देखने वाले हैं,
जाने कब ये वक्त रुकने वाला है,
जाने कब हम रुकने वाले हैं............
द्वारा – निरज कुमार सिंह






