दिघवारा (सारण) गंगा, गंडक और सोन के संगम स्थित हरिहर क्षेत्र सोनपुर का महत्व सिर्फ एशिया के प्रसिद्ध पशु मेला से ही नहीं इसकी पौराणिक ऐतिहासिक, धार्मिक और सांस्कृतिक महत्ता लोक प्रसिद्ध है। बिहारी हिन्दी की तीन मुख्य बोलियां भोजपुरी, मैथिल और मगही का संगम है सोनपुर। भोजपुरियां जवानों की जिंदादिली सहित मैथिली की उपबोली बज्जिाका की मधुर भाषिता से उपेत सोनपुर में सब कुछ है। सच तो यह है कि सांस्कृतिक और साम्प्रदायिक समन्वय की पुण्य भूमि है हरिहर क्षेत्र जहां सरस्वती, लक्ष्मी और काली सदानीरा गंगा, नारायणी और सोन के रूप में प्रवाह्यंमान है। पद्म पुराणानुसार-गंडका गंगयोधर्मध्ये क्षेत्र हरिहरामिश्रम, तत्र स्नात्वा जलंपीत्वा नरो नारायणो भवेत। हरि (विष्णु) और हर (शिव) के संपूजन स्वरूप हरिहर क्षेत्र संज्ञा से विभूषित सोनपुर साम्प्रदायिक सौहार्द का प्रतीक स्थल है। हरिहर नाथ मंदिर में स्थापित लिंग हरि लीले और हर श्याम वर्ण में मूर्तिमान है। शालिग्रामी निर्मित लिंग और लिंग के पीछे भगवान श्रीहरि विष्णु की प्रतिमा अद्वितीय है। लोक मतानुसार लिंग की पीछे स्थित भगवान विष्णु की प्रतिमा च्चवन ऋषि के कुंड से प्राप्त हुई है। वामनपुराणानुसार कोनहरा घाट गजेन्द्र मोक्ष धाम है। दक्षिनेश्वर काली की प्रतिमा, गौरीशंकर मंदिर दर्शनीय है।
यद्यपि सोनपुर का उल्लेख वैदिक काल से लेकर शुंगकाल सोनपुर का उल्लेख अस्पष्ट है। शोधार्थियों के अनुसार चीनी यात्री फाटयान और यूनानी राजदूत मेगास्थनीज की डायरी से स्पष्ट होता है कि वर्तमान सोनपुर उक्कवेलपुर नाम से प्रसिद्ध था। भगवान बुद्ध ने उक्कवेलपुर सोनपुर में अपनी अमृतवाणी और उपदेश की वर्षा की थी। लोक प्रचलित मान्यताओं के अनुसार वर्तमान हाजीपुर हरिपुर का विदेशज रूप है। भक्त कवि हृदय राम का एक पत्र नाभा दास के नाम से स्पष्ट है कि संवत 1626 में हरिहर क्षेत्र मेला लगा था।
चित्रकुट से चलिकै तुलसी हरिपुर आयो से स्पष्ट है कि हाजीपुर का नाम हरिपुर था। रमचौड़ा मंदिर और तुलसी बाड़ी गोस्वामी तुलसी दास की स्मृतियों को संजोए हुए है। हाजीपुर स्थित गोस्वामी की स्मृतियों की पुष्टि 1913 में मेहापंडित राहुल सांस्कृत्यायन ने स्वयं पहुंचकर की थी। संभवत: राजा शिव सिंह एवं हाजी इलियास के वंशज हुसैन शाह के बीच संग्राम में राजा की पराजय के बाद हरिपुर का नाम हाजीपुर हो गया हो।
हाजीपुर हरिपुर और हरपुरनंद परमानंदपुर स्टेशन दोनों के मध्य स्थित सोनपुर वैष्णव और शैव मतावलंबियों की संधि भूमि है। इतिहासकारों ने जैन, बौद्ध, नानक और कबीरपंथ, नाथ पंथ आदि पथों की समन्वय भूमि के रूप में सोनपुर को परखा है। यद्यपि हरिहर क्षेत्र मेला का आरंभ 1822 से माना जाता है। 1860 ई. में लार्ड मार्टिन के आदेशानुसार प्राचीन हरिहर नाथ मंदिर का सौंदर्यीकरण व विस्तार के साथ सोनपुर एशिया प्रसिद्ध पशु मेला के रूप में मानचित्र पर आया। यद्यपि पशु मेले का आकर्षण धीरे-धीरे समाप्त होता जा रहा है। अब हाथी न आ रहे है और बिक रहे हैं। फिर भी कार्तिक पूर्णिमा पर स्नान और बाबा हरिहरनाथ का जलाभिषेक हेतु पुण्य भूमि सोनपुर पूरे अगहन मास भक्तों से भरी पड़ी रहती है।
achhi jankari.
ReplyDeleteधन्यवाद
Deleteबहुत बढिया जानकारी.
ReplyDeleteधन्यवाद
Deletenarayan narayan
ReplyDeleteहिंदी ब्लॉग लेखन के लिए स्वागत और शुभकामनायें
ReplyDeleteकृपया अन्य ब्लॉगों को भी पढें तथा अपने सुन्दर
विचारों से उत्साहवर्धन करें
धन्यवाद...मैं प्रयाश करूँगा
Deleteचिटठा जगत में आपका हार्दिक स्वागत है. लेखन के द्वारा बहुत कुछ सार्थक करें, मेरी शुभकामनाएं.
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महिलाओं के प्रति हो रही घरेलू हिंसा के खिलाफ [उल्टा तीर] आइये, इस कुरुती का समाधान निकालें!
धन्यवाद
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